भ्रष्टाचार से भरा गुबार धूल में बदल गया
“भ्रष्टाचार से भरा गुबार धूल में बदल गया”
मित्रों ! सुनने में यह वाक्य कितना अच्छा लगता है ,निश्चय ही यह ईमानदारी और निष्ठा के प्रति हमारी आस्था को मजबूत भी करता है| किन्तु इस समूचे परिदृश्य के पीछे की स्थितियों को यदि गौर से देखें तो क्या कुछ सवाल मन में नहीं उठते ?
२. 12 वर्षों का समय कम नहीं होता, प्रश्न उठता है, कोई विषैला वृक्ष कैसे 12 वर्षों तक पल्लवित होता रहा और प्रशासन की दृष्टि नहीं गई उस पर ? गई किन्तु मामला क़ानूनी प्रक्रिया में उलझा रहा |
३. 11 वर्ष से कानून की फाइलों में चहलकदमी करता,इठलाता यह मुद्दा ...क्या हमारी क़ानूनी प्रक्रिया जिम्मेदार नहीं ? अगर समय पर निर्णय हो जाता तो आज जो धन, हाथों के श्रम, प्रकृति के खनन के विनाश से राष्ट्रीय क्षति हुई वह न होती | क्या इस राष्ट्रीय क्षति के जिम्मेदारों की श्रंखला को नहीं देखा जाना चाहिए ?
४. क्यों हम इस तरह के भ्रष्टाचार को पनपने का इतना अवसर देते हैं कि यह राष्ट्रीय मुद्दा बन जाय, अफ़सोस हमारी जनता टेलीविजन के सामने बैठ इस मुद्दे की मौन दर्शक बनी रहती है, कहीं जनता को उलझाने के लिए तो ये मुद्दे खड़े नहीं किये जाते?ताकि जनता के अपने मुद्दे दबाये जा सकें ?
५. आज इस इमारत को धराशाही करने जो उर्जा, धन और श्रम लगा उसकी क्षतिपूर्ति कौन करेगा ? निश्चय ही राष्ट्रीय संम्पत्ति से हुआ , तो यह सम्पत्ति जनता की गाढ़ी कमाई का हिस्सा है जिसे किसी उत्पादक कार्य में लगाया जाता तो देश के हालात में सुधार होता |
६. इमारतों को गिराने की योजना, व्यवस्था बनाने में 181 दिन लगे, 500 मीटर तक धूल का बवंडर उड़ा, तेज बारूद की गंध, ध्वनि प्रदूषण, कई-कई टेंकर पानी ....क्या हमारे देश के हालात ऐसे हैं कि हम इतना अनर्थक व्यय करें ? समय रहते हालात काबू में करते तो क्या इससे बचा जा सकता था ?
७. अमले का दावा है कि उन्होंने आसपास की इमारतों को पोलीथिन से कवर किया,500 मीटर तक किसी को वहां आने इजाजत नहीं, 370 कुत्तों को आसपास से बहाल कर उनकी जान बचाई | क्या वे धमाके की आवाज से उन इमारतों को बचा पाए ? वे मासूम परिंदे जिनका इन इमारतों पर आशियाना रहा होगा ,क्या उनका नन्हा सा दिल इन धमाके को सह पाया होगा ...निश्चित ही नहीं तो उनकी हत्या का जिम्मेदार कौन ?
८. माना लोगों को वहां से बहाल किया किंतु इस एक दिन में इतने लोगों का जो समय नष्ट हुआ,दफ्तरों में काम करने वालों को रविवार का दिन कितना महत्वपूर्ण हैं हम सभी अनुभव कर सकते हैं। हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि हमारे देश के इंजीनियर, ठेकेदार भी भ्रष्टाचार नामक कीड़े के शिकार हैं, उनका निर्माण स्तर हम जानते हैं | ऐसे में धमाके में आसपास की बिल्डिंग्स में हुई क्षति का जिम्मेदार कौन ? आसपास की हरियाली जो एक महानगर में यूं भी एक मुद्दा है ,क्या बारूदी धमाके में वह हरियाली सुरक्षित रह पाएगी?
९. विश्व गुरु वाला हमारा देश, आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि को किस रूप में देख रहा है, क्या यह खबर एक समृध्द देश की बुध्दिमता की परिचायक है ?
१०. मीडिया जिस तरह इस समाचार को प्रदर्शित कर रहा था, उसमें केवल व्यावसायिकता नजर आ रही थी ,कहीं भी क्षोभ जैसी कोई बात नजर नहीं आई |
मित्रों संभव है यह मेरा अपना नजरिया हो किन्तु सच भी इससे अधिक दूर नहीं कि इन सब हालातों को रोका जा सकता था यदि जड़ पकड़ते ही इस विषैले वृक्ष की जड़ काट दी जाती |



महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए हैं आपने बधाई।
ReplyDeleteबहुत शुक्रिया नीलम जी
ReplyDeleteकलम को नमन
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